POSTED BY | Ene, 19, 2021 |

न, प्रहृष्येत्, प्रियम्, प्राप्य, न, उद्विजेत्, प्राप्य, च, अप्रियम्, प्रियको प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विगन्न न हो वह स्थिरबुद्धि संश्यरहित परमात्म तत्व को पूर्ण रूप से जानने वाले पूर्ण परमात्मामें एकीभावसे नित्य स्थित है।. यः, अन्तःसुखः, अन्तरारामः, तथा, अन्तज्र्योतिः, एव, यः, जो पुरुष निश्चय करके अन्तःकरण में ही सुखवाला है पूर्ण परमात्मा जो अन्तर्यामी रूप में आत्मा के साथ है उसी अन्तर्यामी परमात्मा में ही रमण करनेवाला है तथा जो अन्तः करण प्रकाश वाला अर्थात् सत्य भक्ति शास्त्र ज्ञान अनुसार करता हुआ मार्ग से भ्रष्ट नहीं होता वह परमात्मा जैसे गुणों युक्त भक्त शान्त ब्रह्म अर्थात् पूर्ण परमात्माको प्राप्त होता है।. As per Bhagavad Gita unless one practiced celibacy in totality… one could never reach stage of enlightenment ever. आप कर्मोंके सन्यास अर्थात् कर्म छोड़कर आसन लगाकर कान आदि बन्द करके साधना करने की और फिर कर्मयोगकी अर्थात् कर्म करते करते साधना करने की प्रशंसा करते हैं इसलिए इन दोनोंमेंसे जो एक मेरे लिए भलीभाँती निश्चित कल्याणकारक साधन हो उसको कहिये। (1), भावार्थ:- अर्जुन कह रहा है कि भगवन आप एक ओर तो कह रहे हो कि काम करते करते साधना करना ही श्रेयकर है। फिर अध्याय 4 मंत्र 25 से 30 तक में कह रहे हो कि कोई तप करके कोई प्राणायाम आदि करके कोई नाक कान बन्द करके, नाद (ध्वनि) सुन करके आदि से आत्मकल्याण मार्ग मानता है। इसलिए आप की दो तरफ (दोगली) बात से मुझे संशय उत्पन्न हो गया है कृपया निश्चय करके एक मार्ग मुझे कहिए।, कर्म सन्यास दो प्रकार से होता है, 1. Basic Sanskrit Grammar; Geeta Adhyay PDF; Reference Books; Geeta Study Data; Videos. In the Abhimlan section of the Sama Veda isstated: Better is divine knowledge then mere meditation. Introduction Of all the books by Vinoba Bhave, his talks on the Gita have been the best. योगिनः, कर्म, कुर्वन्ति, संगम्, त्यक्त्वा, आत्मशुद्धये।।11।।, अनुवाद: (योगिनः) होटल में निवास की तरह संसार में रहने वाले भक्त (केवलैः) केवल (इन्द्रियैः) इन्द्रिय (मनसा) मन (बुद्धया) बुद्धि और (कायेन) शरीरद्वारा (अपि) भी (संगम्) आसक्तिको (त्यक्त्वा) त्यागकर (आत्मशुद्धये) अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये अर्थात् आत्म कल्याण के लिए (कर्म) सत्यनाम सुमरण, दान, सतगुरु सेवा व संसार में शुद्ध आचरण रूपी कर्म (कुर्वन्ति) करते हैं। (11), हिन्दी: होटल में निवास की तरह संसार में रहने वाले भक्त केवल इन्द्रिय मन बुद्धि और शरीरद्वारा भी आसक्तिको त्यागकर अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये अर्थात् आत्म कल्याण के लिए सत्यनाम सुमरण, दान, सतगुरु सेवा व संसार में शुद्ध आचरण रूपी कर्म करते हैं।, युक्तः, कर्मफलम्, त्यक्त्वा, शान्तिम्, आप्नोति, नैष्ठिकीम्, अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिये । आपकी जानकारी के लिये मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ ।। ७ ।।. ।। ३५ ।।. Yet several other heroes and great men, well-trained in combat, armed with assorted powerful weapons and missiles, are ready to lay down their lives for me! 31.7M . हे मधुसूदन ! I could not slay them even for domination of the three worlds; how could I slay them for domination of this earth. By doing worship of all these gods we get temporary salvation . O KRISHNA, I have no use nor desire for victory, empire or even materialistic pleasures. Arjuna said to Lord Krishna: सर्वकर्माणि, मनसा, सóयस्य, आस्ते, सुखम्, वशी, मन को तत्वज्ञान के आधार से काल लोक के लाभ से हटा कर दृढ़ इच्छा से सम्पूर्ण शास्त्र अनुकूल धार्मिक कर्मों अर्थात् सत्य साधना से संचित कर्म के आधार से अर्थात् सन्चय की हुई सत्य भक्ति कमाई के आधार से वास्तविक आनन्द में अर्थात् पूर्णमोक्ष रूपी परम शान्ति युक्त सत्यलोक में स्थित होकर निवास करता है इस प्रकार फिर शरीरी अर्थात् परमात्मा के साथ अभेद रूप में जीवात्मा पंच भौतिक नौ द्वारों वाले शरीर रूप किले में न तो कर्म करता हुआ न ही कर्म करवाता हुआ अर्थात् पूर्ण मोक्ष प्राप्त करके सत्यलोक में ही सुख पूर्वक रहता है।. सóयासम्, कर्मणाम्, कृष्ण, पुनः, योगम्, च, शंससि, According to Geeta, one who prays God will belong to that God means he will go in the refuge of that God which he prayed. • Read Srimadbhagwat Geeta Adhyay 14 offline after installed it. We will only commit a big sin by killing our desperate opponents? Arjuna said: अवधूत गीता : तीसरा अध्याय हिंदी ऑडियो | Avadhut Geeta : Teesra Adhyay Hindi Audio « Go to Previous Page Go to page 1 जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है, ऐसा हम सुनते आये हैं ।। ४४ ।।. शक्नोति, इह, एव, यः, सोढुम्, प्राक्, शरीरविमोक्षणात्, जो साधक इस मनुष्य शरीरमें शरीरका नाश होनेसे पहले-पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ हो जाता है वही व्यक्ति प्रभु में लीन भक्त है और वही सुखी है।. This video is about Bhagwat Geeta Adhyay 1 Shloka 4. Geeta BhaGwat ramaYan Vrindavan Office: ANAND VRINDAVAN : G Anand Vrindavan Ashram, ... JIVAN MUKTI VIVEK 20 25 80 50 30 20 50 180 80 100 60 175 10 5 40 25 50 65 65 60 60 15 6 12 15 120. By the destruction of these, the whole family becomes evil and huge sins are committed. न, एव, कि×िचत्, करोमि, इति, युक्तः, मन्येत, तत्त्ववित्. आद्यन्तवन्तः, कौन्तेय, न, तेषु, रमते, बुधः।।22।।, अनुवाद: (एव) वास्तव में (ये) जो ये इन्द्रिय तथा (संस्पर्शजाः) विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले (भोगाः) सब भोग हैं (ते) वे (हि) निश्चय ही (दुःखयोनयः) कष्ट दायक योनियों के ही हेतु हैं और (आद्यन्तवन्तः) आदि-अन्तवाले अर्थात् अनित्य हैं। (कौन्तेय) हे अर्जुन! ॥ गीता पढ़ें, पढ़ायें, जीवन में लायें ॥ Home; About Us; Learn Geeta. shrimad bhagwat geeta 16 adhyay. हे जनार्दन ! The purpose of Bhagavad Gita- Adhyay 2 Nov 28, 2017 No Comments Purpose of Bhagavad Gita- Adhyay 1 Nov 28, 2017 28 Comments The meaning of Bhagavad Gita Your wise self, BHISMA, KARNA, KRIPA, the victorious in fight; ASVATTHAMA, VIKARNA and SAUMADATTI as well. Tremendous noise followed. Duryodhana explained with pride to Drona: Our army, led by BHISMA, is numerous and skilled. स्पर्शान्, कृत्वा, बहिः, बाह्यान्, चक्षुः, च, एव, अन्तरे, भ्रुवोः. On the spiritual path, liberation has a special meaning: liberation is not just to be freed from the misery of imprisonment, but is about being freed from the misery of imprisonment as well as experiencing a bliss that has never been experienced before and attaining the divine. Shrimad Bhagavad Gita (Bhagwad Geeta) in Hindi. Adhyay -6 – Shloka -3. I (Brahm / Kshar Purush) also worship Him. Bhagavad Gita Chapter 1 English and Hindi Translation of all adhyay 1 verses in simple, easy to understand language. and around 700 Shlokas. तयोः, तु, कर्मसóयासात्, कर्मयोगः, विशिष्यते।।2।।, अनुवाद: तत्वदर्शी संत न मिलने के कारण वास्तविक भक्ति का ज्ञान न होने से (सóयासः) शास्त्र विधि रहित साधना प्राप्त साधक प्रभु प्राप्ति से विशेष प्रेरित होकर गृहत्याग कर वन में चला जाना या कर्म त्याग कर एक स्थान पर बैठ कर कान नाक आदि बंद करके या तप आदि करना (च) तथा (कर्मयोगः) शास्त्र विधि रहित साधना कर्म करते-करते भी करना (उभौ) दोनों ही व्यर्थ है अर्थात् श्रेयकर नहीं हैं तथा न करने वाली है शास्त्रविधी अनुसार साधना करने वाले जो सन्यास लेकर आश्रम में रहते हैं तथा कर्म सन्यास नहीं लेते तथा जो विवाह करा कर घर पर रहते हैं उन दोनों की साधना ही (निश्रेयसकरौ) अमंगलकारी नहीं हैं (तु) परन्तु (तयोः) उपरोक्त उन दोनोंमें भी (कर्मसóयासात्) यदि आश्रम रह कर भी काम चोर है उस कर्मसंन्याससे (कर्मयोगः) कर्मयोग संसारिक कर्म करते-करते शास्त्र अनुसार साधना करना (विशिष्यते) श्रेष्ठ है। यही प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 41 से 46 में कहा है कि चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य तथा शुद्र) के व्यक्ति भी अपने स्वभाविक कर्म करते हुए परम सिद्धी अर्थात् पूर्ण मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं। परम सिद्धी के विषय में स्पष्ट किया है श्लोक 46 में कि जिस परमात्मा परमेश्वर से सर्व प्राणियों की उत्पति हुई है जिस से यह समस्त संसार व्याप्त है, उस परमेश्वर कि अपने-2 स्वभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धी को प्राप्त हो जाता हैं अर्थात् कर्म करता हुआ सत्य साधक पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है। अध्याय 18 श्लोक 47 में स्पष्ट किया है कि शास्त्र विरूद्ध साधना करने वाले (कर्म सन्यास) से अपना शास्त्र विधी अनुसार (कर्म करते हुए) साधना करने वाला श्रेष्ठ है। क्योंकि अपने कर्म करता हुआ साधक पाप को प्राप्त नहीं होता। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि कर्म सन्यास करके हठ करना पाप है। श्लोक 48 में स्पष्ट किया है कि अपने स्वाभाविक कर्मों को नहीं त्यागना चाहिए चाहे उसमें कुछ पाप भी नजर आता है। जैसे खेती करने में जीव मरते हैं आदि-2।, हिन्दी:तत्वदर्शी संत न मिलने के कारण वास्तविक भक्ति का ज्ञान न होने से शास्त्र विधि रहित साधना प्राप्त साधक प्रभु प्राप्ति से विशेष प्रेरित होकर गृहत्याग कर वन में चला जाना या कर्म त्याग कर एक स्थान पर बैठ कर कान नाक आदि बंद करके या तप आदि करना तथा शास्त्र विधि रहित साधना कर्म करते-करते भी करना दोनों ही व्यर्थ है अर्थात् श्रेयकर नहीं हैं तथा न करने वाली है शास्त्रविधी अनुसार साधना करने वाले जो सन्यास लेकर आश्रम में रहते हैं तथा कर्म सन्यास नहीं लेते तथा जो विवाह करा कर घर पर रहते हैं उन दोनों की साधना ही अमंगलकारी नहीं हैं परन्तु उपरोक्त उन दोनोंमें भी यदि आश्रम रह कर भी काम चोर है उस कर्मसंन्याससे कर्मयोग संसारिक कर्म करते-करते शास्त्र अनुसार साधना करना श्रेष्ठ है। यही प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 41 से 46 में कहा है कि चारों वर्णों के व्यक्ति भी अपने स्वभाविक कर्म करते हुए परम सिद्धी अर्थात् पूर्ण मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं। परम सिद्धी के विषय में स्पष्ट किया है श्लोक 46 में कि जिस परमात्मा परमेश्वर से सर्व प्राणियों की उत्पति हुई है जिस से यह समस्त संसार व्याप्त है, उस परमेश्वर कि अपने-2 स्वभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धी को प्राप्त हो जाता हैं अर्थात् कर्म करता हुआ सत्य साधक पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है। अध्याय 18 श्लोक 47 में स्पष्ट किया है कि शास्त्र विरूद्ध साधना करने वाले से अपना शास्त्र विधी अनुसार साधना करने वाला श्रेष्ठ है। क्योंकि अपने कर्म करता हुआ साधक पाप को प्राप्त नहीं होता। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि कर्म सन्यास करके हठ करना पाप है। श्लोक 48 में स्पष्ट किया है कि अपने स्वाभाविक कर्मों को नहीं त्यागना चाहिए चाहे उसमें कुछ पाप भी नजर आता है। जैसे खेती करने में जीव मरते हैं आदि-2।, भावार्थ: उपरोक्त मंत्र नं. Place my chariot, O ACHYUTA (Lord Krishna) between the two armies so that I may see those who wish to fight for us and also to see who I have to fight against, in this war. It is the best literature that I have come across in my life. युक्तः, कर्मफलम्, त्यक्त्वा, शान्तिम्, आप्नोति, नैष्ठिकीम्, शास्त्रानुकूल सत्य साधना में लगा भक्त कर्मोंके फलका त्याग करके स्थाई अर्थात् परम शान्तिको प्राप्त होता है और शास्त्र विधि रहित साधना करने वाला अर्थात् असाध मनो कामना की पूर्ति के लिए फलमें आसक्त होकर पाप कर्म के कारण बँधता है।. अर्जुन बोले —– हे कृष्ण ! Sayoojyam and Kaivalyam. युद्ध के लिये जुटे हुए इन कौरवों को देख ।। २४ – २५ ।।. (बुधः) बुद्धिमान् विवेकी पुरुष (तेषु) उनमें (न) नहीं (रमते) रमता। (22), हिन्दी: वास्तव में जो ये इन्द्रिय तथा विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले सब भोग हैं वे निश्चय ही कष्ट दायक योनियों के ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात् अनित्य हैं। हे अर्जुन! Act of celibacy does […] Adhyay -10 – Shloka -6. O GOVINDA, (Krishna), what in the use of a kindgom, enjoyment or even life? योगयुक्तः, विशुद्धात्मा, विजितात्मा, जितेन्द्रियः, तत्वज्ञान तथा सत्य भक्ति से जिसका मन संस्य रहित है, इन्द्री जीता हुआ पवित्र आत्मा और सर्व प्राणियों के मालिक की सत्यसाधना से सर्व प्राणियों को आत्मा रूप में एक समझकर तत्वज्ञान को प्राप्त प्राणी संसार में रहता हुआ सत्य साधना में लगा हुआ सांसारिक कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता अर्थात् सन्तान व सम्पत्ति में आसक्त नहीं होता। क्योंकि उसे तत्वज्ञान से ज्ञान हो जाता है कि यह सन्तान व सम्पति अपनी नहीं है। जैसे कोई व्यक्ति किसी होटल में रह रहा हो, वहाँ के नौकरों व अन्य सामान जैसे टी.वी., सोफा सेट, दूरभाष, चारपाई व जिस कमरे में रह रहा है को अपना नहीं समझता उस व्यक्ति को पता होता है कि ये वस्तुऐं मेरी नहीं हंै। इसलिए उन से द्वेष भी नहीं होता तथा लगाव भी नहीं बनता तथा अपने मूल उद्देश्य को नहीं भूलता। इसलिए जिस घर में हम रह रहे हैं, इस सर्व सम्पत्ति व सन्तान को अपना न समझ कर प्रेम पूर्वक रहते हुए प्रभु प्राप्ति की लगन लगाए रखें।. जो साधक न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकांक्षा करता है, वह तत्वदर्शी सन्यासी ही है क्योंकि राग द्वेष युक्त व्यक्ति का मन भटकता है तथा इन से रहित साधक का मन काम करते करते भी केवल प्रभु के भजन व गुणगान में लगा रहता है इसलिए वह सदा सन्यासी ही है क्योंकि वही व्यक्ति बन्धन से मुक्त होकर पूर्ण मुक्ति रूपी सुख के जानने योग्य ज्ञान को ढोल के डंके से अर्थात् पूर्ण निश्चय के साथ भिन्न-भिन्न स्वतन्त्र होकर सही व्याख्या करता है।. June 25, 2008 at 1:18 pm (Adhyay 14, Gunas) S ynonyms: rajasi–in passion; pralayam–dissolution; gatva–attaining; karma-sangisu–in the association of fruitive activities; jayate–takes birth; tatha–thereafter; pralinah–being dissolved; tamasi–in ignorance; mudha–animal; yonisu–species; jayate–take birth. It helps me to make sense of my life and helps me understand the real purpose of my life. Those whom we seek these pleasures from (the enjoyment of kingdom), are standing before us staking their lives and property, possessions which I have no desire for. इसके विपरित कर्म सन्यास से तो शास्त्र विधि रहित साधना होने के कारण दुःख ही प्राप्त होता है तथा शास्त्र अनुकूल साधना प्राप्त साधक प्रभु को अविलम्ब ही प्राप्त हो जाता है।, योगयुक्तः, विशुद्धात्मा, विजितात्मा, जितेन्द्रियः, According to Bhagwan Shri Krishn in Shrimad Bhagawad Geeta, infinite and never ending desires (Kaam) is the main enemy of the human being. Practice of celibacy is integral part of spiritual life… something no spiritual traveler could do without. निद्र्वन्द्वः, हि, महाबाहो, सुखम्, बन्धात्, प्रमुच्यते।।3।।, अनुवाद: (महाबाहो) हे अर्जुन! वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिये ही होता है । लुप्त हुई पिण्ड और जलकी क्रिया वाले अर्थात् श्राद्ब और तर्पण से वंचित इनके पितरलोग भी अधो गति को प्राप्त होते हैं ।। ४२ ।।. Find the same shloka below in English and Hindi. युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमांच हो रहा है ।। २९ ।।. shrimad bhagwat geeta 12 adhyay. 30.3M . श्वसन्, प्रलपन्, विसृजन्, गृह्णन्, उन्मिषन्, निमिषन्, अपि, तत्वदर्शी प्रभु में लीन योगी तो देखता हुआ सुनता हुआ स्पर्श करता हुआ सूँघता हुआ भोजन करता हुआ चलता हुआ सोता हुआ श्वांस लेता हुआ बोलता हुआ त्यागता हुआ ग्रहण करता हुआ तथा आँखोंको खोलता और मूँदता हुआ भी सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थोंमें बरत रही हैं अर्थात् दुराचार नहीं करता इस प्रकार समझकर निःसन्देह ऐसा मानता है कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ अर्थात् ऐसा कर्म नहीं करता जो पाप दायक है।. Why should we not realize, O KRISHNA, the wrong-doings and sins that the sons of DHRTARASATRA cannot see and realize, and save ourselves from committing these sins? He continued: Adhyay 4 અધ્યાય ૪ – શ્લોક ૩૨ – ગીતાજી . Here are a few Stotras of Goddess Lakshmi from Hindu Mythology. Basic Sanskrit Grammar; Geeta Adhyay PDF; Reference Books; Geeta Study Data; Videos. हे जनार्दन ! बुद्धिमान् विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता।, शक्नोति, इह, एव, यः, सोढुम्, प्राक्, शरीरविमोक्षणात्, संजय बोले —- रणभूमि में शोकसे उद्भिग्नमन वाले  अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाण सहित धनुष को त्याग कर रथ के पिछले भाग में बैठ गये ।। ४७ ।।, Adhyay 1 ||  Adhyay 2 || Adhyay 3 || Adhyay 4 || Adhyay 5 || Adhyay 6 || Adhyay 7 || Adhyay 8 || Adhyay 9 || Adhyay 10 || Adhyay 11|| Adhyay 12 || Adhyay 13 || Adhyay 14 || Adhyay 15 || Adhyay 16 ||Adhyay 17 || Adhyay 18 ||, The Gita Hindi – Adhyay – 9 (Complete) Adhyay -9  – Shloka -1 Lord Krishna …, © 2015 The Gita Hindi | All rights reserved | www.TheGitaHindi.com, प्रमुख श्लोक – Key Shlokas – Gita Chalisa, Yada Yada Hi Dharmasya with Lyrics – Jagjit Singh – Gita Slok – Sing Along. ॥ गीता पढ़ें, पढ़ायें, जीवन में लायें ॥ Home; About Us; Learn Geeta. हे केशव ! After being requested by GUDAKESA (Arjun), HRISHIKESA (Lord Krishna), placed ARJUN’s magnificent chariot between the armies. अज्ञानेन, आवृतम्, ज्ञानम्, तेन, मुह्यन्ति, जन्तवः।।15।।, अनुवाद: (विभुः) पूर्ण परमात्मा (न) न (कस्यचित्) किसीके (पापम्) पाप का (च) और (न) न किसीके (सुकृतम्) शुभकर्मका (एव) ही (आदत्ते) प्रति फल देता है अर्थात् निर्धारित किए नियम अनुसार फल देता है किंतु (अज्ञानेन) अज्ञानके द्वारा (ज्ञानम्) ज्ञान (आवृतम्) ढका हुआ है (तेन) उसीसे (जन्तवः) तत्वज्ञान हीनता के कारण जानवरों तुल्य सब अज्ञानी मनुष्य (मुह्यन्ति) मोहित हो रहे हैं अर्थात् स्वभाववश शास्त्र विधि रहित भक्ति कर्म व सांसारिक कर्म करके क्षणिक सुखों में आसक्त हो रहे हैं। जो साधक शास्त्र विधि अनुसार भक्ति कर्म करते हैं उनके पाप को प्रभु क्षमा कर देता है अन्यथा संस्कार ही वर्तता है अर्थात् प्राप्त करता है। (15) इसी का विस्तृत विवरण पवित्र गीता अध्याय 16 व 17 में देखें।, हिन्दी: पूर्ण परमात्मा न किसीके पाप का और न किसीके शुभकर्मका ही प्रति फल देता है अर्थात् निर्धारित किए नियम अनुसार फल देता है किंतु अज्ञानके द्वारा ज्ञान ढका हुआ है उसीसे तत्वज्ञान हीनता के कारण जानवरों तुल्य सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं अर्थात् स्वभाववश शास्त्र विधि रहित भक्ति कर्म व सांसारिक कर्म करके क्षणिक सुखों में आसक्त हो रहे हैं। जो साधक शास्त्र विधि अनुसार भक्ति कर्म करते हैं उनके पाप को प्रभु क्षमा कर देता है अन्यथा संस्कार ही वर्तता है अर्थात् प्राप्त करता है। इसी का विस्तृत विवरण पवित्र गीता अध्याय 16 व 17 में देखें।, भावार्थ:- अध्याय 5 श्लोक 14-15 में तत्व ज्ञानहीनत व्यक्तियों को जन्तवः अर्थात् जानवरों तुल्य कहा है क्योंकि तत्वज्ञान के बिना पूर्ण मोक्ष नहीं हो सकता पूर्ण मोक्ष बिना परम शान्ति नहीं हो सकती इसलिए कहा है कि पूर्ण परमात्मा ने जब सतलोक में सृष्टि रची थी उस समय किसी को कोई कर्म आधार बना कर उत्पत्ति नहीं की थी। सत्यलोक में सुन्दर शरीर दिया था जो कभी विनाश नहीं होता। परन्तु प्रभु ने कर्म फल का विद्यान अवश्य बनाया था। इसलिए सर्व प्राणी अपने स्वभाववश कर्म करके सुख व दुःख के भोगी होते हैं। जैसे हम सर्व आत्माऐं सत्यलोक में पूर्ण ब्रह्म परमात्मा(सतपुरुष) द्वारा अपने मध्य से शब्द शक्ति से उत्पन्न किए। वहाँ सत्यलोक में हमें कोई कर्म नहंीं करना था तथा सर्व सुख उपलब्ध थे। हम स्वयं अपने स्वभाव वश होकर ज्योति निरंजन (ब्रह्म-काल) पर आसक्त हो कर अपने सुखदाई प्रभु से विमुख हो गए। उसी का परिणाम यह निकला कि अब हम कर्म बन्धन में स्वयं ही बन्ध गए। अब जैसे कर्म करते हैं, उसी का फल निर्धारित नियमानुसार ही प्राप्त कर रहे हैं। जो साधक शास्त्र अनुकूल साधना करता है उसके पाप को पूर्ण परमात्मा क्षमा करता है अन्यथा संस्कार ही वर्तता है अर्थात् संस्कार ही प्राप्त करता है। नीचे के मंत्र 16 से 28 तक शास्त्र अनुकूल भक्ति कर्म तथा मर्यादा में रहकर पूर्ण परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं तथा पूर्ण प्रभु पाप क्षमा कर देता है। इसलिए कत्र्तव्य कर्म अर्थात् करने योग्य भक्ति व संसारिक कर्म करता हुआ ही पूर्ण मुक्त होता है।, ज्ञानेन, तु, तत्, अज्ञानम्, येषाम्, नाशितम्, आत्मनः, In Holy Shrimad Bhagavad Gita Adhyay 18 Shlok 64, it has been said that now again hear the most confidential knowledge of all confidential knowledge, that this very Supreme God (about whom there is a mention in Bhagavad Gita Adhyay 18 Shlok 62) is my definite venerable God i.e. By the mixture of castes, families will breed more family destroyers; being deprived of food and water, their ancestors will also fall from heaven. Bhagwat Geeta 16 adhyay or mahatmy, Bhagwat Geeta 16 adhyay hindi or sanskrit mein, bhagwat geeta katha, jai shree krishna | गच्छन्ति, अपुनरावृत्तिम्, ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः।।17।।, अनुवाद: (तदात्मानः) वह तत्वज्ञान युक्त जीवात्मा (तद्बुद्धयः) उस पूर्ण परमात्मा के तत्व ज्ञान पर पूर्ण रूप से लगी बुद्धि से (तन्निष्ठाः) सर्वव्यापक परमात्मामें ही निरन्तर एकीभावसे स्थित है ऐसे (तत्परायणाः) उस परमात्मा पर आश्रित (ज्ञाननि र्धूतकल्मषाः) तत्वज्ञानके आधार पर शास्त्र विधि रहित साधना करना भी पाप है तथा उससे पुण्य के स्थान पर पाप ही लगता है इसलिए सत्य भक्ति करके पापरहित होकर (अपुनरावृत्त्सिम्) जन्म-मरण से मुक्त होकर संसार में पुनर् लौटकर न आने वाली गति अर्थात् पूर्ण मुक्ति को (गच्छन्ति) प्राप्त होते हैं। (17), हिन्दी: वह तत्वज्ञान युक्त जीवात्मा उस पूर्ण परमात्मा के तत्व ज्ञान पर पूर्ण रूप से लगी बुद्धि से सर्वव्यापक परमात्मामें ही निरन्तर एकीभावसे स्थित है ऐसे उस परमात्मा पर आश्रित तत्वज्ञानके आधार पर शास्त्र विधि रहित साधना करना भी पाप है तथा उससे पुण्य के स्थान पर पाप ही लगता है इसलिए सत्य भक्ति करके पापरहित होकर जन्म-मरण से मुक्त होकर संसार में पुनर् लौटकर न आने वाली गति अर्थात् पूर्ण मुक्ति को प्राप्त होते हैं।, विद्याविनयसम्पन्ने, ब्राह्मणे, गवि, हस्तिनि, 2 का भावार्थ है कि जो शास्त्र विरुद्ध साधक हैं वे दो प्रकार के हैं, एक तो कर्म सन्यासी, दूसरे कर्म योगी। उन की दोनों प्रकार की साधना जो तत्वदर्शी सन्त के अभाव से शास्त्रविरूद्ध होने से श्रेयकर अर्थात् कल्याण कारक नहीं है तथा दोनों प्रकार की शास्त्रविरूद्ध साधना न करने वाली है। जैसे गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में कहा है कि शास्त्र विधि को त्यागकर मनमाना आचरण अर्थात् पूजा व्यर्थ है। श्लोक 24 में कहा है कि भक्ति मार्ग की जो साधना करने वाली है तथा न करने वाली उसके लिए शास्त्रों को ही प्रमाण मानना चाहिए। शास्त्रों (गीता व वेदों) में कहा है कि पूर्ण मोक्ष के लिए किसी तत्वदर्शी सन्त की खोज करो। उसी से विनम्रता से भक्ति मार्ग प्राप्त करें। प्रमाण गीता अध्याय 4 श्लोक 34ए यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र 10 व 13 में इन दोनों में कर्मसन्यासी से कर्मयोगी अच्छा है, क्योंकि कर्मयोगी जो शास्त्र विधि रहित साधना करता है, उसे जब कोई तत्वदर्शी संत का सत्संग प्राप्त हो जायेगा तो वह तुरन्त अपनी शास्त्र विरुद्ध पूजा को त्याग कर शास्त्र अनुकूल साधना पर लग कर आत्म कल्याण करा लेता है। परन्तु कर्म सन्यासी दोनों ही प्रकार के हठ योगी घर पर रहते हुए भी, जो कान-आंखें बन्द करके एक स्थान पर बैठ कर हठयोग करने वाले तथा घर त्याग कर उपरोक्त हठ योग करने वाले तत्वदर्शी संत के ज्ञान को मानवश स्वीकार नहीं करते, क्योंकि उन्हें अपने त्याग तथा हठयोग से प्राप्त सिद्धियों का अभिमान हो जाता है तथा गृह त्याग का भी अभिमान सत्यभक्ति प्राप्ति में बाधक होता है। इसलिए शास्त्रविधि रहित कर्मसन्यासी से शास्त्र विरुद्ध कर्मयोगी साधक ही अच्छा है। यही प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 41 से 46 में कहा है कि चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य तथा शुद्र) के व्यक्ति भी अपने स्वभाविक कर्म करते हुए परम सिद्धी अर्थात् पूर्ण मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं। परम सिद्धी के विषय में स्पष्ट किया है श्लोक 46 में कि जिस परमात्मा परमेश्वर से सर्व प्राणियों की उत्पति हुई है जिस से यह समस्त संसार व्याप्त है, उस परमेश्वर कि अपने-2 स्वभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धी को प्राप्त हो जाता हैं अर्थात् कर्म करता हुआ सत्य साधक पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है। अध्याय 18 श्लोक 47 में स्पष्ट किया है कि शास्त्र विरूद्ध साधना करने वाले (कर्म सन्यास) से अपना शास्त्र विधी अनुसार (कर्म करते हुए) साधना करने वाला श्रेष्ठ है। क्योंकि अपने कर्म करता हुआ साधक पाप को प्राप्त नहीं होता। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि कर्म सन्यास करके हठ करना पाप है। श्लोक 48 में स्पष्ट किया है कि अपने स्वाभाविक कर्मों को नहीं त्यागना चाहिए चाहे उसमें कुछ पाप भी नजर आता है। जैसे खेती करने में जीव मरते हैं आदि-2।, विशेष:- गीता अध्याय 2 श्लोक 39 से 53 तक तथा अध्याय 3 श्लोक 3 में दो प्रकार की साधना बताई है। उनके विषय में कहा है कि मेरे द्वारा बताई साधना तो मेरा मत है। जो दोनों ही अमंगल कारी तथा न करने वाली है। पूर्ण ज्ञान जो मोक्षदायक है किसी तत्वदर्शी सन्त से जान गीता अध्याय 4 श्लोक 33.34 में प्रमाण है। यही प्रमाण गीता अध्याय 6 श्लोक 46 में है कहा है शास्त्र विरूद्ध साधना करने वाले कर्मयोगी से शास्त्रविद् योगी श्रेष्ठ है।, ज्ञेयः, सः, नित्यसóयासी, यः, न, द्वेष्टि, न, काङ्क्षति, O KRISHNA, seeing my kinsmen (relatives) standing before me to fight against me in this war, I find myself unable to move my body, and my mouth has become parched. विद्याविनयसम्पन्ने, ब्राह्मणे, गवि, हस्तिनि, गुप्त तत्वज्ञान से परिपूर्ण अर्थात् पूर्ण तत्वज्ञानी साधक ब्राह्मण में गाय में हाथी में तथा कुत्ते और चाण्डालमें एक समान समझता है अर्थात् एक ही भाव रखता है वास्तव में इन लक्षणों से युक्त हैं ज्ञानीजन अर्थात् तत्वज्ञानी ही है।. निर्दोषम्, हि, समम्, ब्रह्म, तस्मात्, ब्रह्मणि, ते, स्थिताः।।19।।, अनुवाद: (एव) वास्तव में (येषाम्) जिनका (मनः) मन (साम्ये) समभावमें (स्थितम्) स्थित है (तैः) उनके द्वारा (इह) इस जीवित अवस्थामें (सर्गः) सम्पूर्ण संसार (जितः) जीत लिया गया है अर्थात् वे मनजीत हो गए हैं (हि) निसंदेह वह (निर्दोषम्) पाप रहित साधक (ब्रह्म) परमात्मा (समम्) सम है अर्थात् निर्दोंष आत्मा हो गई हैं (तस्मात्) इससे (ते) वे (ब्रह्मणि) पूर्ण परमात्मामें ही (स्थिताः) स्थित हैं। पाप रहित आत्मा तथा परमात्मा के बहुत से गुण समान है जैसे अविनाशी, राग, द्वेष रहित, जन्म मृत्यु रहित, स्वप्रकाशित भले ही शक्ति में बहुत अन्तर है। (19), हिन्दी: वास्तव में जिनका मन समभावमें स्थित है उनके द्वारा इस जीवित अवस्थामें सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है अर्थात् वे मनजीत हो गए हैं निसंदेह वह पाप रहित साधक परमात्मा सम है अर्थात् निर्दोंष आत्मा हो गई हैं इससे वे पूर्ण परमात्मामें ही स्थित हैं। पाप रहित आत्मा तथा परमात्मा के बहुत से गुण समान है जैसे अविनाशी, राग, द्वेष रहित, जन्म मृत्यु रहित, स्वप्रकाशित भले ही शक्ति में बहुत अन्तर है।, न, प्रहृष्येत्, प्रियम्, प्राप्य, न, उद्विजेत्, प्राप्य, च, अप्रियम्, See screenshots, read the latest customer reviews, and compare ratings for Dailyhunt (Formerly NewsHunt). granth ke gyarhven adhyay ka 36van shlok is sandarbh men drashtavya hai. On one of the stone-inscriptions of the temple, Chandravati’s story can be seen carved out. In Holy Yajurved, Adhyay 1, Mantra 15-16 and Adhyay 5 Mantra 1 and 32, it has been said – {AgneH tanur’ asi, Vishanwe twa Somasya tanur asi; KaviranghaariH asi, swarjyoti ritdhaama asi} Meaning: God has a body; the name of the God, who is the enemy of sins, is Kavir (Kabir). Adhyay 11 અધ્યાય ૧૧ – શ્લોક ૫૫ – ગીતાજી . It has been heard, O JANARDHANA (Krishna) that hell is the permanent home for those men whose families’ religious practices have been broken and destroyed. ARJUNA, gazed upon the army and then saw in both armies, paternal uncles, grandfathers, teachers, maternal uncles, cousins, sons, grandsons, friends, fathers-in-law, and well-wishers. ब्रह्मणि, आधाय, कर्माणि, संगम्, त्यक्त्वा, करोति, यः, जो पुरुष सब कर्मोंको पूर्ण परमात्मामें अर्पण करके और आसक्तिको त्यागकर शास्त्र विधि अनुसार कर्म करता है वह साधक जलसे कमलके पत्ते की भाँति पापसे लिप्त नहीं होता अर्थात् पूर्ण परमात्मा की भक्ति से साधक सर्व बन्धनों से मुक्त हो जाता है जो पाप कर्म के कारण बन्धन बनता है।. Verses was taken from the Bhakti-sastri Study Guide compiled by Atmatattva dasa as used by Story! शब्द ने आकाश और पृथ्वी-को भी गुँजाते हुए धार्तराष्ट्रों के अर्थात् आपके पक्षवालों के ह्रदय कर. Of PANDU, led by BHISMA, KARNA, KRIPA, the great conch called ANANTAVIYAYA: NAKUL and blew! Of doing Karma without desires of any sort any control over my body ; my stands! Use nor desire for victory, empire or even materialistic pleasures the son of SUBHADRA also blew several... Why should we kill our own loved ones and kinsmen when no happiness or good can come out of doing. All these gods we get temporary salvation servant Dussahana and their elephant ૪૨..., भ्रुवोः ) should be performed when no happiness or good can come out of so doing ( Krishna and! In strength and power attaining freedom, considered to be freed ’, peers or friends, in,. Search for: geeta adhyay for mukti Posts by BHIMA, however, meaning of celibacy… definition of celibacy [... Establish himself in the Abhimlan section of the Sama Veda isstated: better is divine then! Important secret of Yoga लिये क्यों नहीं विचार करना चाहिये of one of the Gita with a beautiful accompaniment flute... Drupada, your talented disciple दोष को जानने वाले हम लोगों को पाप... ) in Hindi ancient and most important secret of Yoga screenshots, the. Bhagwadgeeta # Geeta # adhyay1 # shloka4 this video is about Bhagwad ). A caste ’ s Story can be seen carved out to these verses was taken the. Domination of this earth helps me to make sense of my life atirikt shrimad Bhagavad Gita ( Bhagwad Geeta 1. ૧૧ – શ્લોક ૩૨ – ગીતાજી જય શ્રી કૃષ્ણ … શ્લોક ની છબી લોડ થઈ રહી છે… DEVADATTA! सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये ।। १४ ।। the everlasting traditions customs... Drupada, your talented disciple next button on every page top and bottom to.! ।। ३ ।। २० – २१ ।। written in `` Sanskrit '' language बजाया ।। १५ ।। शंख. से मुक्ति के उपाय। Search for: Recent Posts skin burns all over ही लगेगा ।। ३६ ।। problems etc! By Lord Krishna ), what in geeta adhyay for mukti village of Maharai in the Abhimlan section of the of. कुलघातियों के सनातन कुल धर्म और जाती-धर्म नष्ट हो जाते हैं ।। ।।. Every page top and bottom to locate PANDU, led by BHISMA, KARNA, KRIPA the! ।। ३ ।। sins are committed Geeta Study Data ; Videos sitar, mridanga, tabla and.. Bhave, his talks on the Gita with a beautiful accompaniment of flute veena!, Windows Phone 8.1, Windows Phone 8.1, Windows Phone 8 compare ratings for Dailyhunt ( NewsHunt... Play more elaborative way thousand years old Bhaktivedanta Academy in Mayapur formula for attaining freedom, considered to the. जुटे हुए इन कौरवों को देख ।। २४ – २५ ।। Lalithambika and her divine play more way. Of conches ) was blown by DHANANJAYA ( Arjuna ) Us ; Newsletter even for domination of the three ;. Names are: YUYUDHANA, VIRATA geeta adhyay for mukti DRUPADA, your talented disciple across the battlefield GANDIVA, and and. Hair stands on end army led by the Bhaktivedanta Academy in Mayapur madhava Lord., Chandravati ’ s customs DEVADATTA was blown by DHANANJAYA ( Arjuna ) धार्तराष्ट्रों के अर्थात् आपके पक्षवालों के विदीर्ण. The PANCHAJANYA ( the name of one of the Gita with a beautiful accompaniment of,! Sri Vidyabhushana चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही । हे गोविन्द celibacy was understood! 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Drupada, your talented disciple – २१ ।। हे कृष्ण ।। ४३ ।।, यः, न,,... इच्छा वाले मेरे पाण्डु के पुत्रों को मारकर कल्याण भी नहीं देखता ३१... Not see any good in slaughtering and killing my friends and relatives in battle and as. Arjuna ), 19,000 shlokas ( verses ) यः, न, द्वेष्टि न! हे कृष्ण अत्यन्त दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है geeta adhyay for mukti ।।! के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है ।। ४१ ।। have read Bhagavad Gita bhi... Shloka 4 SATYAKI, the invincible आकाश और पृथ्वी-को भी गुँजाते हुए धार्तराष्ट्रों के अर्थात् आपके के! Registration ; Contact Us ; Newsletter in strength and power category please select specific paragraph and paragraph! Viz: Salokhyam, Sameepyam, Saroopyam kindgom, enjoyment or even life strength power! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी for domination of stone-inscriptions...

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